मैं भारत हूँ!

मैं भारत हूँ। अब मैं बूढा और दुखी हो चुका हूँ। मैं अंदर ही अंदर अपनो से इतना टूट गया हूँ। कि बाहरी दुश्मनों का तो क्या बोलू। मैं आज उस चौराहे पर खड़ा हूँ। जहाँ से मेरा वजूद नजर आता है। जिस प्रकार आज मेरे ही बेटे हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई,जैन बंट गए हैं। सभी एक एक दूसरे के खून के प्यासे। कानून नामक मेरा भाई है जो अब मेरे बच्चो को तोड़ने और जोड़ने का काम कर रहा हैं। अपने ही भाई के हाथों अपने बच्चो को एक दूसरे से लड़ा रहा हैं। मेरा ही भाई मुझे कमजोर करने में लगा हैं। मैने मेरे भाई को सदियो पहले कहा था कि तुम हमेसा सही को तवज्जो देना लेकिन आज मेरा भाई सिर्फ नोटो की महक में इतना अंधा हो गया हैं की अपने ही परिवार अपने भाई के बच्चो को मरवाने और कटवाने का कार्य कर रहा हैं।

  मैं सदियो से दुनिया मे अपना रुतबा बना कर रखा था। लेकिन आज मेरा परिवार और मेरा वजूद खतरे में हैं। आज मैं अंदर ही अंदर रो रहा हूँ। कि जितनी मेरी हालत अपनो ने बुरी की उतनी बाहर वालो ने नही। और अगर बाहर वालो ने मुझ लूटा तो कमसे कम पराये तो थे। लेकिन जब अपने ही लूटने लगे। तब क्या करूँ और किसे कहु।
   मेरी पत्नी भारत माता जिसको जो सभी भारतवासियों की माता कहलाती हैं। लेकिन आज इसी के पुत्र अपनी ही माता के ओढ़नी के चिन्थड़े करने में लगा हुआ हैं।
  सभी अपनी माँ के वजूद को मिटाने में लगे हुए हैं। किसी को अपने माँ और बाप की परवाह नही। अब मेरा वृदाश्रम जाने का समय आ गया हैं। बड़ा अफसोस हैं। कि जिन बेटो(हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई,जैन) पर मुझे गर्व था आज उन्ही बेटों से मुझे घृणा हो गयी हैं।
 कोई मेरे लिए नही लड़ रहा,कोई मेरी रक्षा नही करना चाहता। सभी बेटों और पोतों ने अपना अपना बनाना शुरू कर दिया हैं। मैं अकेला खामोश पड़ा सिर्फ बूढ़ी आंखों से अपने उजड़ते घर को देख रहा हूँ। न अब मेरे बाजुओं में इतनी ताकत ही बची है। की मैं अब लडू। लडू तो भी किससे। सामने अपना ही परिवार हैं।
कभी मेरा वजूद था। तब मेरे बेटे और भाई मेरे लिये अपना सबकुछ दांव पर लगाने के लिए तैयार रहते  थे। मेरे काबिल पुत्र, राम,लक्ष्मण,कृष्ण,मोहम्मद,शिवा,प्रताप,आजाद,बिस्मिल,सावरकर,सुभाष,गांधी, और हजारो जो मेरे एक इशारे पर अपना सबकुछ छोड़ने पर तैयार रहते थे। मेरी पुत्रियां सतिया और सावित्री,सीता और हजारो जोहर करने वाली। मेरे लिए अपना सुहाग का सिर काटने वाली हाड़ी रानी।
 अब किया बताऊँ किसे बताऊँ। कौन सुनता हैं। आज मेरे पड़ोसियों का बोलबाला हैं। मेरे पड़ोसी आज मेरे घर को तोड़ने में लगे हैं। और मेरे बच्चे आज मेरे से ज्यादा पड़ोसियों की सुनते हैं। आह! अब तो बोला भी नही जाता।
दुम घुट रहा हैं। नजर कमजोर हो गयी है। काश आज बुढ़ापे में मेरे बच्चे और भाई और पड़ोसी साथ देते और मेरा सुनते।
  मै कभी परायो से नही हारा। न ही सदियो से तलवारों से हार मानी। न कभी किसी के सामने घुटने टेके। न कभी अपना वजूद काम होने दिया। क्योकी मेरे अपने मेरे साथ थे।
 लेकिन आज उम्र के इस पड़ाव पर मैं सिर्फ और सिर्फ अकेला खड़ा नजर आता हूं। जहा तक मेरी नजर जाती है। सिर्फ और सिर्फ मैं अपने आप को टूटता और लुटता देख रहा हूँ। और मेरी पत्नी अपने बच्चो के लिए बिलख रही हैं। लेकिन कर क्या सकते हैं। बच्चे बड़े हो गए और भाई मेरे से ज्यादा समझदार हो गए।
आज मुझे पता चला कि बाहर वालो से लड़ना आसान हैं। लेकिन अपनो से लड़ना असम्भव।
 आज मेरे पास सबकुछ हैं। खेती हैं,उद्योग हैं,वीर सिपाही हैं।
लेकिन अच्छे नेता और अधिकारी नही हैं। तो मेरा घर अब टूटने की कगार पर हैं। कारण अपने स्वार्थ और पेट को ही सबकुछ मान लिया हैं। चाहे दूसरा भाई भूख से तड़प कर मर रहा हो। मेरे ही बच्चे मेरे ही घर से चोरी और धोखाधड़ी कर रहे है। जिस घर के बच्चे अपने ही घर से चोरी और धोखाधडी करे उस घर को कौन बचा सकता हैं।
 आज मै लाचार बेबस और गिरता भारत बन गया। कभी मेरे नाम की पताकाएं दुनिया मे लहराती थी आज मेरे बेटे उसे काट कर अपना रुमाल बना रहे हैं।
यह हैं मेरी दस्ता। मैं बूढा भारत। मेरा लिबास तिरंगा।
भारत।

लेखक
मोती सिंह राठौड़

जोइन्तरा
बावडी,जोधपुर
राजस्थान।
9665151996
ईमेल : mainbharathoon1@gmail.com

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