ये कैसे स्कूल और शिक्षा व्यवस्था!

सरकार का नारा चलो स्कूल,बालिका पढ़ाओ,देश शिक्षित तो दुनिया मुठी में। ऐसे अनगिनित नारे आये दिन हम अखबार और टीवी में सरकार द्वारा चलाये जा रहे विज्ञापन। लेकिन क्या वास्तव में देश और राज्यो की शिक्षा व्यवस्था में सबकुछ सही हैं। मेरे कहना है नही।
    आज देश और राज्यो की शिक्षा व्यवस्था एक दम बेकार और लापरवाह होने के साथ साथ बच्चो के भविष्य से खिलवाड़ हैं।
     बेचारे माँ बाप अपने जीवन को दुख तकलीफ में डाल कर अपने बच्चो का भाविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए स्कूल भेजते हैं। ताकि पढ़ लिख कर बालक और बालिका अपने जीवन को उच्चस्तर पर ले जा सके लेकिन जहा तक हम जानते हैं और पढ़ा हैं।शिक्षा आज बेकार और बेमतलब की हो गयी हैं। सिर्फ पेट पालने का जरिया बनकर रह गयी हैं।
  मैं स्कूल की शिक्षा के काफी नजदीक से गुजर चुका हूँ। मैंने भी 1996 में स्कूल में पढ़ाया हैं। स्कूल तक खोलने और कोचिंग चलाया हैं। लेकिन जब मुझे पता चला कि शिक्षा सिर्फ व्यापार हैं। मैने स्कूल और कोचिंग बंद कर दिये।
   मैं मेरे गाँव की स्कूल में गया और वहाँ भी मैंने पाया कि स्कूल में दसवीं कक्षा में अंग्रेजी,विज्ञान और संस्कृत के आध्यापक ही नही हैं। और बच्चे दसवीं का बोर्ड देंगे। जो कि बच्चो के भाविष्य के साथ खिलवाड़ हैं।
  जिस देश की दुनिया मे इज्जत संस्कार,संस्कृति और संस्कृत से है उस देश मे संस्कृत के ही अध्यापक नही हैं। जो अपने आप मे बहुत बड़ी चिंता का विषय हैं।
  मैं अंदर ही अंदर इतना दुखी हूं। कि मेरा भारत कौनसी दिशा में आगे बढ़ रहा हैं। क्या यही देश हैं। क्या यही देश की शिक्षा व्यवस्था हैं। क्या यही हमारे बच्चो को दिशा देने का कार्य हैं। क्या यही युवाओं को गुमराह करने का कार्य हैं। क्या यही बच्चे आगे चलकर देश और दुनिया मे सक्ष्म नागरिक बनेंगे। ऐसे कई सवालों से मेरा मस्तिक फटा जा रहा हैं।
  क्या सरकार को शिक्षा नीति को उत्तम बनाकर सही शिक्षा के महत्व को आगे बढ़ाना जरूरी नही। क्या सरकार को शिक्षा नीति को उज्ज्वल भविष्य के लिए सही बनाकर बच्चो के भाविष्य को एक नई उड़ान नही देनी चाहिए।
    अगर सरकार सोच समझ कर अगर शिक्षा के क्षेत्र में कमी कर रही हैं तो कम से कम उन माँ बाप को तो बक्श दो जो अपने बेटे बेटियों को स्कूल भेज कर खेती से लेकर जीवन के हर क्षेत्र में अपने आप को खपा रहे हैं। बिना अपने बच्चो का सहारा लिए।
   

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